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    उत्तराखंड में जमीन विवाद पर नया नियम, पुलिस हस्तक्षेप कम

    hillwaniBy hillwani उत्तराखण्ड
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    देहरादून:

     उत्तराखंड में जमीनों के विवाद से पुलिस को दूर रखने का बड़ा फैसला किया गया है. स्पष्ट निर्देश है कि बिना लैंड फ्राड कमेटी की संस्तुति के कोई FIR ऐसे मामलों में नहीं की जाएगी. दरअसल, पिछले लंबे समय से जमीनों के मामलों पर पुलिस की दखलंदाजी की बात सामने आती रही है. ऐसे में इसे सरकार का बड़ा फैसला माना जा रहा है.

    उत्तराखंड में जमीन से जुड़े विवाद लंबे समय से प्रशासन और पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं. खासतौर पर देहरादून समेत मैदानी जिलों में जमीनों के सौदे, फर्जी रजिस्ट्री और कब्जों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं. इन परिस्थितियों के बीच राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए जमीन से जुड़े विवादों में पुलिस की भूमिका को सीमित करने का निर्णय लिया है.

    सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी: सरकार ने साफ निर्देश दिए हैं कि अब लैंड फ्रॉड के मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी, बल्कि पहले इन मामलों की जांच लैंड फ्रॉड कमेटी करेगी और उसके बाद ही आगे की कार्रवाई होगी. दरअसल पिछले कुछ वर्षों में यह लगातार आरोप लगते रहे हैं कि जमीन विवादों में पुलिस की दखलंदाजी अधिक हो जाती है, जिससे कई बार मामले अनावश्यक रूप से आपराधिक स्वरूप ले लेते हैं.

    लैंड फ्रॉड कमेटी की जांच के बाद दर्ज होगी एफआईआर: कई शिकायतों में यह भी कहा गया कि सिविल प्रकृति के मामलों में भी पुलिस की एंट्री से विवाद और जटिल हो जाते हैं. यही कारण है कि अब सरकार ने यह व्यवस्था लागू करने का फैसला किया है. सरकार के इस फैसले के तहत स्पष्ट किया गया है कि जमीन से जुड़े किसी भी फ्रॉड या विवाद के मामले में सीधे पुलिस में एफआईआर दर्ज नहीं होगी. पहले इन मामलों को लैंड फ्रॉड कमेटी के समक्ष रखा जाएगा. कमेटी द्वारा जांच और सत्यापन के बाद यदि यह पाया जाता है कि मामला वास्तव में लैंड फ्रॉड का है, तभी पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए जाएंगे.

    इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सिविल और राजस्व से जुड़े मामलों में पुलिस की अनावश्यक दखलंदाजी न हो और केवल वास्तविक आपराधिक मामलों में ही पुलिस कार्रवाई करे. सरकार के इस फैसले को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चा होती रही है. भाजपा के वरिष्ठ नेता और हरिद्वार से सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत भी पहले इस मुद्दे को उठा चुके हैं.

    पूर्व सीएम त्रिवेंद्र ने भी दी थी यही सलाह: उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि प्रदेश में कानून व्यवस्था पर असर पड़ने की एक वजह यह भी है कि पुलिस का काफी समय जमीन विवादों में चला जाता है. त्रिवेंद्र सिंह रावत का मानना था कि जमीन से जुड़े मामलों का समाधान मुख्य रूप से राजस्व और प्रशासनिक तंत्र के जरिए होना चाहिए और पुलिस को ऐसे मामलों से लगभग दूर ही रखा जाना चाहिए. इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए लैंड फ्रॉड समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई.

    गढ़वाल कमिश्नर ने ली बैठक: इस बैठक की अध्यक्षता गढ़वाल कमिश्नर और मुख्यमंत्री के सचिव विनय शंकर पांडे ने की. बैठक में जमीन से जुड़े लंबित मामलों की समीक्षा की गई और कई अहम फैसले लिए गए. समीक्षा के दौरान यह सामने आया कि वर्ष 2021 से जमीन विवाद से जुड़े अनेक मामले अभी तक लंबित हैं, जिनका निस्तारण नहीं हो पाया है.

    गढ़वाल क्षेत्र में लैंड फ्रॉड के 200 से ज्याद मामले लंबित: गढ़वाल क्षेत्र की बात करें तो यहां करीब 200 लैंड फ्रॉड के मामले लंबित पाए गए. इन मामलों के समाधान के लिए समिति ने एक विशेष अभियान चलाने का निर्णय लिया. इसके तहत 15 दिन के भीतर इन मामलों से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट मंगाने के निर्देश दिए गए हैं. समिति ने इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए यह भी तय किया कि लंबित मामलों के निस्तारण के लिए लगातार बैठकें आयोजित की जाएंगी.

    लंबित मामलों के जल्द से जल्द निटपाने पर जोर: बैठक के दौरान अब तक हुई कार्रवाई की भी समीक्षा की गई. समिति ने बताया कि गढ़वाल क्षेत्र में जमीन विवाद से जुड़े करीब 40 मामलों का निस्तारण किया जा चुका है. हालांकि अभी भी लगभग 160 मामले ऐसे हैं जिनका समाधान होना बाकी है. इन मामलों के निस्तारण के लिए अगले 15 दिनों के भीतर एक और बैठक बुलाने का निर्णय लिया गया है, ताकि लंबित मामलों को जल्द से जल्द निपटाया जा सके.

    8 मामलों में पुलिस का एफआईआर दर्ज करने के निर्देश: बैठक में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में जमीन धोखाधड़ी के स्पष्ट संकेत मिले हैं. ऐसे करीब 8 मामलों में समिति ने पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं. इसके अलावा जिन मामलों में जांच चल रही है, उनमें संबंधित अधिकारियों से जल्द रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है.

    लैंड फ्रॉड से जुड़े कई मामले तहसीलदार और उपजिलाधिकारी (एसडीएम) स्तर पर भी लंबित पाए गए हैं. ऐसे मामलों के समाधान को लेकर भी बैठक में निर्देश जारी किए गए हैं. संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि इन मामलों का निस्तारण अधिकतम तीन महीने के भीतर किया जाए, ताकि वर्षों से लंबित विवादों को खत्म किया जा सके.

    नई व्यवस्था से पारदर्शिता आएगी: सरकार का मानना है कि इस नई व्यवस्था से जमीन विवादों के समाधान में पारदर्शिता आएगी और अनावश्यक आपराधिकमुकदमों से भी बचा जा सकेगा. साथ ही पुलिस का ध्यान भी वास्तविक कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण की ओर केंद्रित रहेगा. हालांकि लैंड फ्रॉड कमेटी में अपने मामलों को रखने के लिए पहुंचे लोगों का मानना यह भी था कि लैंड फ्रॉड कमेटी की बैठक ज्यादा समय बाद नहीं होनी चाहिए. यहां पहुंचे एक शख्स ने बताया कि जून 2025 के बाद अब जाकर लैंड का समिति की बैठक में उन्हें बुलाया गया है.

    less police intervention New rules on land disputes in Uttarakhand

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